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#सर्वेक्षण_विज्ञान ----------------------
सर्वेक्षण (Surveying) उस कलात्मक विज्ञान को कहते हैं जिससे पृथ्वी की सतह पर स्थित बिंदुओं की समुचित माप लेकर, किसी पैमाने पर आलेखन (plotting) करके, उनकी सापेक्ष क्षैतिज और ऊर्ध्व दूरियों का कागज या, दूसरे माध्यम पर सही-सही ज्ञान कराया जा सके। इस प्रकार का अंकित माध्यम लेखाचित्र या मानचित्र कहलाता है। ऐसी आलेखन क्रिया की संपन्नता और सफलता के लिए रैखिक और कोणीय, दोनों ही माप लेना आवश्यक होता है। सिद्धांतत: आलेखन क्रिया के लिए रेखिक माप का होना ही पर्याप्त है। मगर बहुधा ऊँची नीची भग्न भूमि पर सीधे रैखिक माप प्राप्त करना या तो असंभव होता है, या इतना जटिल होता है कि उसकी यथार्थता संदिग्ध हो जाती है। ऐसे क्षेत्रों में कोणीय माप रैखिक माप के सहायक अंग बन जाते हैं और गणितीय विधियों से अज्ञात रैखिक माप ज्ञात करना संभव कर देते हैं। इस प्रकार सर्वेक्षण में तीन कार्य सम्मिलित होते हैं -
1 - क्षेत्र अध्ययन
2 - मानचित्रण
3 - अभिकलन
#आधुनिक_विज्ञान -
सबसे प्राचीन प्रमाण ईसा से 370 वर्ष पूर्व का मिला है, जो ट्यूरिन के अजायबघर में आज भी सुरक्षित है। यूनान और मिस्र में भी शिलाओं और लकड़ी के तख्तों पर सर्वेक्षण के प्राचीन आलेख मिले हैं। ऑस्ट्रिया में ईसापूर्व काल के कुछ ऐसे चिह्न मिले हैं जिनसे पता लगता है कि रोम साम्राज्य में सर्वेक्षण का प्रचलन था। उन्होंने मार्गों की सीध बाँधने के लिए आज जैसे उपकरण, सर्वेक्षण पट्ट (plane table) और दूसरा नापने के लिए अंकित छड़ों का प्रयोग किया था। ऐसे भी प्रमाण मिले हैं कि 300 वर्ष ईसापूर्व भारत पर आक्रमण के समय, यूनानियों ने सिंध से फारस की खाड़ी तक समुद्रतट नापकर लेखाचित्र तैयार किया था ।
ये एक ऐसा झूठ है जो हम पर थोप दिया गया जबकि वैदिकों साहित्यो में इसके बारे में न सिर्फ विस्तार से उल्लेख है वरन आधुनिक विज्ञान से भी आगे है लेकिन हम सिर्फ पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण में सब भुलाए बैठे है ।।
#वैदिक_साहित्यो_में -
#महाभारत_का_एक_श्लोक_है_जिसमे --
भगवांन वेद व्यास द्वारा पृथ्वी की भौगोलिक रचना का विवरण महाभारत में किया गया है। उन्होंने महाभारत में उल्लेखित किया है कि यह पृथ्वी चन्द्रमंडल से देखने पर दो अंशों में खरगोश तथा अन्य दो अंशों में पीपल के दो पत्तों, के समान दिखायी देती है।
“सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन।
परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥
यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः।
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।”
#अर्थात --
सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भाँति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता है। इसके दो अंशो में पिप्पल और दो अंशो में महान शश (-खरगोश) दिखायी देता है। यदि उपरोक्त संरचना को कागज पर बनाकर व्यवस्थित करें, तो हमारी पृथ्वी का मानचित्र बन जाता है, जो हमारी पृथ्वी के वास्तविक मानचित्र के समान है।
(वेद व्यास, भीष्म पर्व, महाभारत)
(इसका चित्र प्रथम कमेंट में )
पृथ्वी की परिधि की गणना या सर्वेक्षण विज्ञान प्राचीन ही नही अतिप्राचीन और वैदिक है जिसकी पुष्टि हमे आर्यभट्ट की गणना से प्राप्त हो जाती है पूर्व में एक प्रश्न मुझसे पूछा गया था कि महाभारत काल मे आकाश से कैसे देख कर इस श्लोक की रचना की गयी तो इसका जवाब मुझे मिला आर्यभट्ट रचित ग्रन्थो में आइये इसका विश्लेषण करते है -
आर्यभट कि गणना के अनुसार पृथ्वी की परिधि 39,968.0582 किलोमीटर है, जो इसके वास्तविक मान 40,075.0167 किलोमीटर से केवल 0.2% कम है।
महाविज्ञानी आर्यभट्ट के ग्रन्थों में भूपरिधि की नाप का विधि का अस्पष्ट निर्देश प्राप्त होता है। 11वीं शताब्दी में भास्कराचार्य ने इसकी विधि का स्पष्ट उल्लेख किया है।
#विधि - (#technical_detail) -
सर्वेक्षण करने के लिये प्रमुखत: दो तथ्यों को जानना आवश्यक होता है। प्रथम, किसी निश्चित स्थान B के सापेक्ष किसी अन्य स्थान A पर पृथ्वी का झुकाव। अथवा भूमध्य रेखा के सापेक्ष उसके उत्तर या दक्षिण में किसी स्थान पर पृथ्वी का झुकाव या उसका अक्षांश। इसे प्राचीन ग्रन्थों में सार्थक रूप से अक्षांश नाम दिया गया था। इसका मौलिक अर्थ है, अक्ष यानी पृथ्वी की धुरी या केन्द्रबिन्दु से भूपरिधि के किसी बिन्दु B तक खीची गई रेखा तथा उसी केन्द्रबिन्दु से भूपरिधि के किसी अन्य बिन्दु A तक खींची गई रेखा की परस्पर कोणात्मक दूरी या अंश ही अक्षांश है। द्वितीय तथ्य, उस B स्थान से A स्थान की दूरी। इन दो तथ्यों को जानने के पश्चात् भूपरिधि को जानने के लिये अनुपात—विधि का प्रयोग होता है यदि B के सापेक्ष A स्थान के झुकाव पर B से A की अमुक दूरी हो तो गोल पृथ्वी के 360 अंश झुकाव पर कितनी दूरी होगी।
भारतीय ज्योतिष में इन सूचनाओं के आधार पर भूपरिधि का मान ज्ञात कर लिया गया था। सूर्य सिद्धान्त में पृथ्वी का मान 1600 योजन बताया है तथा 1600 & 10 को भूपरिधि माना है। प्राचीन काल में योजन का मान अनिश्चित रहा है , जैसे आज सम्पूर्ण भारत मे बीघा का मान अलग अलग माप का है वैसे ही योजन का मान भी अलग अलग माना गया है ।चीनी यात्री हवेन्सांग के एक विवरण के अनुसार 16,000 या हस्त का एक योजन होता है , तथा इस प्रकार 24,000 फीट का एक योजन होगा। इंग्लिश माप के अनुसार 4854 फीट का एक मील होता है। इस प्रकार 4.94 मील का एक योजन सिद्ध होता है। इस गणना के अनुसार 7904 मील पृथ्वी का व्यास तथा 24994 मील भूपरिधि बनती है। इसे 8/5 से गुणित करने पर 39991 किलोमीटर भूपरिधि सिद्ध होती है। आधुनिक मान्यता इसके बहुत समीप है। प्रकटत: उन्होंने अपनी रीति से भूपरिधि का सही मान प्राप्त करने में सफलता पाई थी।
उपरोक्त विवरण अनुसार इस विधि के परिचालन के लिये उस स्थान के अक्षांश का परिज्ञान आवश्यक है। इसके लिये यह श्लोक कहा गया है —
शंकुच्छायाहते त्रिज्ये विषुवत्कर्णभाजिते।
लम्बाक्षज्ये तयोश्चापे लम्बाक्षौ दक्षिणौ सदा।।
अर्थात् शंकु और उसकी छाया को अलग—अलग त्रिज्या से गुणा करके प्रत्येक गुणनफल को विषुवत्कर्ण से भाग देने पर लम्बज्या और अक्षज्या प्राप्त होती है, जिनके चाप अथवा कोण क्रमश: लम्बांश और अक्षांश होते हैं।
इससे प्रकट है कि उस स्थान A पर शंकु और कर्ण के बीच बनने वाला धनु या कोण उस स्थान का अक्षांश होता है। इसे प्राप्त करने की विधि इस प्रकार है। विषुव संक्रान्ति के दिन जब दिन रात बराबर होते हैं। अथवा यों कहें कि जिस दिन भूमध्य रेखा पर सूर्य सीधा अथवा लम्बवत् चमकता है, (स्पष्टत: उस दिन मध्याह्न में किसी सीधे शंकु या डण्डी की छाया बिल्कुल नहीं बनेगी) उस दिन उस भूमध्यरेखा से उत्तर या दक्षिण दिशा में किसी सुदूर स्थान पर 12 अंगुल की सीधी डण्डी अवनदध करते हैं। इससे उत्तर दिशा मे उत्तर कि ओर उस डण्डी की पलमा अथवा छाया पडेगी। अधिकाधिक उत्तर की ओर जाने पर यह छाया अधिकाधिक लम्बी होती जायगी इस डण्डी तथा धरती पर पडी छाया से जो कर्ण बनेगा, वह भूमध्य के सापेक्ष उस स्थान पर धरती के झुकाव को सूचित करेगा। अत: शंकु और कर्ण पर बनने वाला कोण ही वहां का झुकाव अथवा उस स्थान का अक्षांश सिद्ध होता है।
किसी कोण को बनाने वाली दो सरल रेखाओं को चाहे जितना बढ़ाया जाय, उनसे कोणात्मक दूरी बदलती नही है केवल योजानात्मक दूरी बदलती है यह यहां धरती के केन्द्रबिन्दु से परिधि तक चलने वाली दो रेखाएं बहुत बड़ी है तथा शंकु और कर्ण की रेखाएं बहुत छोटी है। फिर भी इस शंकु कर्ण पर बनने वाला कोण तदनुरूप है, अत: धरती के अक्षांश के ठीक समतुल्य कोण को प्रकट करता है। इसे रेखा गणितीय नियमो के आधार पर भी सिद्ध किया जा सकता है।
पोस्ट में दिए चित्र में पृथ्वी के केन्द्रबिन्दु पर BCA कोण प्राप्त किया गया है, जो कि 30 अंश है। यही भूपरिधि के A बिन्दु का आक्षांश है। चित्र से स्पष्ट देखा जा सकता है कि इस A बिन्दु पर किसी शंकु को अवनद्ध करने पर जो छायाकर्ण बनता है, वह भी ठीक 30 अंश कोण बनाता है। इससे वराहमिहिर का यह कथन समुचित है कि यह कोण अक्षांश कोण को प्रकट करता है।
चित्र से यह भी देखा जा सकता है कि भूमध्य रेखा B पर सूर्यकिरणें सीधी लम्बवत् पड़ रही है। छोटे त्रिभुज के छायाकर्ण B पर भी वह सीधी पड़ रही है। परन्तु हमारी दृष्टि से CB छायाकर्ण टेढ़ा है तथा क्त्र शंकु सीधा है। यह CA शंकु CB छायाकर्ण के साथ उतना कोण बनाता है, जितना कोण भूमध्य रेखा B के सापेक्ष परिधि के A स्थान पर हम स्वयं प्राप्त करते है। अत: यही कोण अक्षांश कोण है।
उदाहरण के लिये मध्य प्रदेश के
#उमरिया जिले से होकर कर्क रेखा गुजरती है। इसके ठीक उत्तर में लखनऊ जिला है। कर्क संक्रान्ति के दिन लखनऊ में शंकु की स्थापना से 3.2 अंश का कोण प्राप्त होता है। भूमध्यरेखा से कर्क रेखा 23.36 है। अत: भूमध्य रेखा से लखनऊ का अक्षांश 23.36 +3.2 = 26.56 सिद्ध होता है। परन्तु कर्क रेखा के सापेक्ष लखनऊ जिले की धरती का झुकाव 3.2 अंश है। साथ ही यह भी जान लिया गया है कि उमरिया की कर्क रेखा से लखनऊ की दूरी 352 किलोमीटर है। अत: अनुपात विधि से भूपरिधि का मान निकलेगा
352 x 360 = 39600 किलोमीटर 3.2
इस अनुपात विधि को इस श्लोक में प्रकट किया गया है—
पुरान्तरं चेदिदमुत्तरं स्यात्तदक्षविश्लेषलवैस्तदा किम्।
चक्रांशकैरिव्यनुपात युक्तया युक्तं निरुक्तं परिधे: प्रमाणम्।।
(सिद्धांत शिरोमणि, भुवनकोश, श्लोक 14)
अर्थात् भूमध्यरेखा से उस आलोच्य स्थान A के अक्षांश में से कर्क रेखा के अक्षांश को घटाने पर प्राप्त अक्षांश में यदि पुरात्तर अर्थात् उस AB रेखा के बीच इतनी दूरी है, तो सम्पूर्ण चक्रांश 360 अंश में कितने योजन की दूरी होगी। इस अनुपात के प्रयोग से सम्पूर्ण भूपरिधि का प्रमाण ज्ञात होता है।
जैसे, उपरिलिखित उदाहरण में,
भूमध्य रेखा के सापेक्ष लखनऊ का अक्षांश — 26.56
कर्क रेखा का अक्षांश — 23.36
कर्क रेखा के सापेक्ष लखनऊ का झुकाव — 26.56—23.36 = 3.2
इस 3.2 अंश झुकाव पर कर्क रेखा से लखनऊ की दूरी पर अनुपात विधि का प्रयोग करने से भूपरिधि का प्रमाण ज्ञात होता है।
आधुनिक युग में भी भूपरिधि इसी विधि से नापी जाती है परन्तु सूक्ष्म यन्त्रों के प्रयोग से यह कार्य अत्यन्त सूक्ष्मता से किया जाता है।
प्राचीन रीति से सम्पूर्ण भूपरिधि का प्रमाण ज्ञात करने के पश्चात् एक अंश में धरती के फासले को भी आसानी से जाना जाता है। प्राचीन काल में कालखण्ड के आधार पर भी धरती की दूरी का पता लगाया जाता है। उस समय एक अहोरात्र में 60 घटी माने गए थे। अत: 39600/60 = 660 किलोमीटर, यह एक घटी देशान्तर कहा जाता है।
आधुनिक युग में भी इसी रीति से एक घण्टा देशान्तर को प्रकट करने की परम्परा है। आधुनिक गणना अनुसार 1 अहोरात्र 24 घण्टे का होता है। अत: 39600/24 =1650 किलोमीटर को एक घण्टा देशान्तर कहा जाता है। घटी से देशान्तर को प्रकट करने की परम्परा आधुनिक पंचागों में भी पाई जाती है।
इसके अतिरिक्त वैदिक साहित्य में कौटिल्य के अर्थशास्त्र और बाणभट्ट के हर्षचरित् में राजस्व के निर्धारण के सिलसिले में भूमि की नाप आदि के उल्लेख मिलते हैं। 1498 ई. में वास्को डा गामा के भारत आने पर एक गुजराती पंडित ने उसे समुद्रतट का एक रेखाचित्र भेंट किया था। इससे विदित होता है कि सभ्यता के मार्ग पर बढ़े हुए सभी देशों में सर्वेक्षण का महत्व निरंतर बढ़ता रहा और कृषि, राजस्व, भूमि के अधिकार की सीमाओं के निर्धारण और यात्राओं में मार्गों के लेखाचित्र बनाने में सर्वेक्षण का अभ्यास एवं प्रयोग होता रहा है।
#विशेष -
भारत में प्राचीनकाल से ही ज्ञान को अत्यधिक महत्व दिया गया है। कला, विज्ञान, गणित और ऐसे अनगिनत क्षेत्र हैं जिनमें भारतीय योगदान अनुपम है। आधुनिक युग के ऐसे बहुत से आविष्कार हैं, जो भारतीय शोधों के निष्कर्षों पर आधारित हैं। विज्ञान के गूढ रहस्यों की सूक्ष्मतम जानकारी भारतीयो को बहुत प्राचीन समय से रही है। सृष्टि के आदि से ही वैदिक साहित्य में निहित ज्ञान-विज्ञान से ऋषि मुनि विज्ञान के गूढ़ रहस्यों का साक्षात्कार करते आये है , सर्वेक्षण विज्ञान उनमे से ही एक है जो अभी भी उपेक्षित पड़ा हुआ है, ऐसे बहोत से वैज्ञानिक अविष्कार हैं जो आधुनिक समय से भी उन्नत तकनीक रखते थे जो धीरे धीरे विस्मृत होते जा रहे है उसे पुनर्जीवित करने की महती आवश्यकता है ।धर्म, दर्शन, विज्ञान, वास्तु, ज्योतिष, खगोल, स्थापत्य कला, नृत्य कला, संगीत कला आदि सभी तरह के ज्ञान का जन्म भारत में हुआ है ऐसा कहने में कोई गुरेज नहीं, क्योंकि इसके हजारों सबूत हैं। मध्यकाल में भारतीय गौरव को नष्ट किया गया और आज का तथाकथित भारतीय व्यक्ति पश्चिमी सभ्यता को महान समझता है।
#सोर्स -
Aryabhata I, His Life and His Contributions". Bulletin of the Astronomical Society of India
http://hdl.handle.net/2248/502Cooke (1997). "The Mathematics of the Hindus". पृ॰ 204.
"Astronomy in India", written at London, in Walker, Christopher, Astronomy before the Telescope, British Museum Press by Pingree, David (1996)
सुद्युम्न आचार्य का लेख निदेशक, वेद वाणी वितान, प्राच्य विद्या शोध संस्थान,सतना(म.प्र.)
वाल्टर यूजीन क्लार्क, द Āryabhaṭīyaऑफ Āryabhaṭa, गणित और खगोल विज्ञान पर एक प्राचीन भारतीय कार्य, शिकागो विश्वविद्यालय प्रेस
महाभारत
#क्रमशः