Wednesday, November 5, 2025

5 nov 2025

 aaj k date me mere pass apna kuch bhi nahi hai

mobile bhi udhaar ka hai

laptop ya desktop apne pass nahi hia

jo bhi kapde pahea raha hoon wo sab 5 6 saal pure hain,

chaddhi baniyaan bhi sasuraal ka diya hua hai apna khareeda hua nahi hai

juta fata hua hai  saal se jayada hi ho gaya hai aur 3 baar silwa chuka hoon

Sunday, July 15, 2018

#वैदिक_साहित्य_और_विज्ञान - #भाग - 13

----------------------- #जीवन_विज्ञान -----------------------

#16_संस्कारो_का_विज्ञान - #भाग - 03

किसी व्यक्ति को सुसंस्कृत बनाने के लिए शिक्षा, सत्संग, वातावरण, परिस्थिति, सूझ-बूझ आदि अनेक बातों की आवश्यकता होती है। सामान्यत: ऐसे ही माध्यमों से लोगों की मनोभूमि विकसित होती है। इसके अतिरिक्त भारतीय तत्व वेत्ताओं ने मनुष्य की अन्त:भूमि को श्रेष्ठता की दिशा में विकसिम करने के लिए कुछ ऐसे सूक्ष्म उपचारों का भी आविष्कार किया है जिनका प्रभाव शरीर तथा मन पर ही नहीं सूक्ष्म अन्त:करण पर भी पड़ता है और उसके प्रभाव से मनुष्य को गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से समुन्नत स्तर की ओर उठने में सहायता मिलती है। इसी आध्यात्मिक उपचार का नाम ‘संस्कार’ है। अब तक कि क्रमशः पिछली पोस्ट में आप सभी ने 4 संस्कारो को पढा अब आगे -

-------------------- #नामकरण_संस्कार --------------------
जन्म के दसवें या बारहवें दिन बच्चे का नाम रखा जाता है। इस संस्कार के समय माता, बालक को शुद्ध वस्त्र से ढ़ँककर एवं उसके सिर को जल से गीला कर पिता की गोद में देती है। इसके पश्चात् प्रजापति, तिथि, नक्षत्र तथा उनके देवताओं, अग्नि तथा सोम की आहुतियाँ दी जाती हैं। तत्पश्चात् पिता शिशु के दाहिने कान की ओर झुकता हुआ उसके नाम का उच्चारण करता है। और इस तरह इस नामकरण संस्कार पूर्ण करते है ,आमतौर से यह संस्कार जन्म के दसवें दिन किया जाता है, उस दिन जन्म सूतिका का निवारण-शुद्धिकरण भी किया जाता है। इसकी विधि का वैज्ञानिक लाभ भी है जिसकी पुष्टि विज्ञान भी करता है ।।

#वैज्ञानिक_दृष्टिकोण1 -
अमेरिका में गिलफर्ड कॉलेज में मनोवैज्ञानिक रिचर्ड कि माने तो अजीब या असामान्य नाम का कोई बुरा प्रभाव तो नहीं होता है लेकिन मानसिक स्थिति में काफी अंतर आ जाता है और नाम का असर व्यक्तित्व पर पड़ता है । वहीं न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी में समाजशास्त्री कॉनली का कहना है कि असामान्य नाम वाले बच्चे अपनी उत्तेजना पर काबू पाना सीख जाते है। यानी कि नाम का असर बच्चे के सामाजिक जीवन पर जरूर पड़ता है ।
अंक ज्‍योतिष कहता है कि जिस तरह मूलांक और भाग्‍यांक व्‍यक्ति के जीवन को प्रभावित करते हैं, उसी प्रकार नाम का भी उन पर काफी असर होता है। अंकशास्त्री बताते हैं कि नाम के पहले अक्षर का प्रभाव खास तौर से व्‍यक्तित्‍व और व्‍यवहार पर पड़ता है।
यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि मनुष्य को जिस तरह के नाम से पुकारा जाता है, उसे उसी प्रकार की छोटी सी अनुभूति होती रहती है, यानि उसके स्वभाव पर नाम का असर होता है, यही कारण है कि जब जीवन में परेशानियां आती हैं तो लोग अपना नाम बदलते हैं
ताकि, नकारात्मक प्रभाव को कम किया जा सके।

#संस्कार_का_विज्ञान - किसी भी ध्वनि के साथ एक आवृति भी जुड़ी होती इसका उदाहरण है कि जब हम ऑसिलोस्कोप यानी ध्वनि मापक यंत्र में अलग-अलग तरह की आवाजें भेजते हैं तो उसमें से हर बार आपको हर स्वर की अलग और एक खास आवृति मिलती है। मतलब ध्वनि के साथ उसकी आवृत्ति भी जुड़ी होती है और हर आवृत्ति का अपना प्रभाव होता है । जब एक बच्चे का जन्म होता है तो उस दिन और समय के हिसाब से लोग सौरमंडल की ज्यामितीय स्थिती की गणना करते हैं और इसके आधार पर एक ऐसी खास ध्वनि तय करते हैं जो नवजात बच्चे के लिए सर्वश्रेष्ठ हो। जिसका बच्चे पर पोसिटिव प्रभाव हो न कि नकारात्मक प्रभाव लेकिन आजकल के दौर में लोग न तो समय देना चाहते है ना वैदिक संस्कारो के वैज्ञानिक दृष्टिकोण को समझना चाहते है ।

बच्चे का नाम उसकी पहचान के लिए नहीं रखा जाता। मनोविज्ञान एवं अक्षर-विज्ञान के जानकारों का मत है कि नाम का प्रभाव व्यक्ति के स्थूल-सूक्ष्म व्यक्तित्व पर गहराई से पड़ता रहता है। नाम सोच-समझकर तो रखा ही जाय, उसके साथ नाम रोशन करने वाले गुणों के विकास के प्रति जागरूक रहा जाय, यह जरूरी है।

--------------------- #निष्क्रमण_संस्कार --------------------

निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना, शिशु का नाम रख लिए जाने के बाद भी उसे कुछ दिनों के लिए मां के पास ही रखा जाता है, निष्क्रमण् संस्कार के तहत पहली बार नवजात शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है, विज्ञान भी इस बात को स्वीकार करता है कि यदि सुबह की ठंडी धूप और शाम को चंद्रमा की शीतल छाया नवजात पर पडती है तो वह पीलिया, टाइफाइड जैसे गंभीर रोगों से सुरक्षित रहता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है। उसे चौथे माह में बाहरी वातावरण में लाया जाता है और फिर धीरे-धीरे वह उसका आदि हो जाता है। निष्क्रमण संस्कार जातक के स्वास्थ्य व उसकी दीर्घायु की कामना के लिये किया जाता है। धार्मिक ग्रंथों में वर्णन भी मिलता है कि

“निष्क्रमणादायुषो वृद्धिरप्युदृष्टा मनीषिभि:”

#वैज्ञानिक_दृष्टिकोण - प्रकाश से लाभन्वित होने के लिए औसतन एक इनसान को 1,000 लक्‍स (प्रकाश की तीव्रता को मापने वाली इकाई) के संपर्क में रहने की जरूरत होती है। घर के अंदर लाइट 300 लक्‍स होती है।
सूरज की रोशनी का पांच फीसदी से भी कम हिस्‍सा इमारतों में पहुंच पाता है। और यह रोशनी एक लाख लक्‍स के बराबर होती है । प्रमुख शोधकर्ता रसेल फोस्‍टर कहते है, 'प्राकृतिक रोशनी के संपर्क में रहने से मस्तिष्‍क से सरोटोनिन हार्मोन का स्राव होता है। इसे हैप्‍पी हार्मोन भी कहते है। यह इनसान का मूड सुधारने और उसे खुशमिजाज बनाने के लिए जिम्‍मेदार होता है।'

वाटसन (Watson) ने जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के फिप्स क्लीनिक (Phipps Clinic of John Hopkins University) में किए गए अध्ययनों के आधार पर यह पाया कि शिशुओं के जन्मकाल से ही ये तीनों संवेग – भय क्रोध तथा प्रेम – विद्यमान रहते हैं । शिशु को अन्धकार से प्रकाश में लाया जाता है, तब उसकी शारीरिक क्रियाओं में कमी पाई जाती है, लेकिन इसके विपरीत उन्हें प्रकाश से अन्धकार में लाने पर क्रियाओं में वृद्धि होती है । प्रैट ने यह भी पाया कि 74'-88'तक के तापमान और आर्द्रता में 22-90% तक के बीच परिवर्तन लाने पर शिशुओं की शारीरिक क्रियाओं पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता । वैज्ञानिकों ने इस बात का भी पता लगाया हैं, कि नवजात शिशु के शरीर का कौनसा भाग अधिक क्रियाशील रहता है । उन्होंने पाया कि शिशु के शरीर के विभिन्न अंगों की क्रियाओं का औसत प्रतिशत इस प्रकार है- सिर में 4%, धड़ में 28%, बाँहों में 21% तथा पैरों में 27% । यानी प्रकाश और अंधकार का बच्चे पर असर पड़ता है पहली बार ।।

#संस्कार_विज्ञान -
निष्क्रमण का अभिप्राय है बाहर निकलना। इस संस्कार में शिशु को सूर्य तथा चन्द्रमा की ज्योति दिखाने का विधान है। भगवान् भास्कर के तेज तथा चन्द्रमा की शीतलता से शिशु को अवगत कराना ही इसका उद्देश्य है। इसके पीछे मनीषियों की शिशु को तेजस्वी तथा विनम्र बनाने की परिकल्पना होगी। उस दिन देवी-देवताओं के दर्शन तथा उनसे शिशु के दीर्घ एवं यशस्वी जीवन के लिये आशीर्वाद ग्रहण किया जाता है। जन्म के चौथे महीने इस संस्कार को करने का विधान है। तीन माह तक शिशु का शरीर बाहरी वातावरण यथा तेज धूप, तेज हवा आदि के अनुकूल नहीं होता है इसलिये प्राय: तीन मास तक उसे बहुत सावधानी से घर में रखना चाहिए। इसके बाद धीरे-धीरे उसे बाहरी वातावरण के संपर्क में आने देना चाहिए। इस संस्कार का तात्पर्य यही है कि शिशु समाज के सम्पर्क में आकर सामाजिक परिस्थितियों से अवगत हो।

#विशेष -
संस्कारों के अध्ययन से पता चलता है कि उनका सम्बन्ध संपूर्ण मानव जीवन से रहा है। मानव जीवन एक महान रहस्य है। संस्कार इसके उद्भव, विकास और ह्रास होने की समस्याओं का समाधान करते थे। जीवन भी संसार की अन्य कलाओं के समान कला माना जाता है। उस कला की जानकारी तथा परिष्करण संस्कारों द्वारा होता था। संस्कार पशुता को भी मनुष्यता में परिणत कर देते थे।
जीवन एक चक्र माना गया है। यह वहीं आरम्भ होता है, जहाँ उसका अंत होता है। जन्म से मृत्यु पर्यंत जीवित रहने, विषय भोग तथा सुख प्राप्त करने, चिंतन करने तथा अंत में इस संसार से प्रस्थान करने की अनेक घटनाओं की श्रृंखला ही जीवन है। संस्कारों का सम्बन्ध जीवन की इन सभी घटनाओं से था।
क्रमशः
।। #धर्मसंस्थापनार्थाय_सम्भवामि_युगे_युगे ।।

Thursday, July 12, 2018

#वैदिक_साहित्य_और_विज्ञान - #भाग - 12

----------------------- #जीवन_विज्ञान -----------------------

#16_संस्कारो_का_विज्ञान - #भाग - 02

प्राचीनकाल में यह महान दायित्व कुटुम्बियों के साथ-साथ संत, पुरोहित और परिव्राजकों को सौंपा गया था। वे आने वाली पीढ़ियों को सोलह अग्नि पुटों से गुजार कर खरे सोने जैसे व्यक्तित्व में ढालते थे। इस परम्परा का नाम ही संस्कार परम्परा है। जिस तरह अभ्रक, लोहा, सोना, पारद जैसी सर्वथा विषैली धातुएँ शोधने के बाद अमृत तुल्य औषधियाँ बन जाती हैं, उसी तरह किसी समय इस देश में मानवेतर योनियों में से घूमकर आई हेय स्तर की आत्माओं को भी संस्कारों की भट्ठी में तपाकर प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्तित्व के रूप में ढाल दिया जाता था। यह क्रम लाखों वर्ष चलता रहा उसी के फलस्वरूप यह देश 'स्वर्गादप गरीयसी' बना रहा, आज संस्कारों को प्रचलन समाप्त हो गया, तो पथ भूले बनजारे की तरह हमारी पीढ़ियाँ कितना भटक गयीं और भटकती जा रही हैं, यह सबके सामने है। आज के समय में जो व्यावहारिक नहीं है या नहीं जिनकी उपयोगिता नहीं रही, उन्हें छोड़ दें, तो शेष सभी संस्कार अपनी वैज्ञानिक महत्ता से सारे समाज को नई दिशा दे सकते हैं। इस दृष्टि से इन्हें क्रांतिधर्मी अभियान बनाने की आवश्यकता है।

पिछली पोस्ट में मैंने गर्भधारण और पुंसवन संस्कार और उसके विज्ञान की जानकारी दी थी अब उसे आगे -

------------------ #सीमन्तोन्नयन_संस्कार -------------------

सीमन्तोन्नयन संस्कार पुंसवन का ही विस्तार है, इसका शाब्दिक अर्थ है- "सीमन्त" अर्थात् 'केश और उन्नयन' अर्थात् 'ऊपर उठाना', इस संस्कार के तहत पति अपनी पत्नी के केशों को संवारते हुए ऊपर की ओर उठाता था, इसलिए इस संस्कार का नाम 'सीमंतोन्नयन' पड़ गया,
इस संस्कार को गर्भ के छठे या आठवें महीने में किया जाता है, यह एक प्रकार से गर्भ की शुद्धि प्रक्रिया है,
इस दौरान बच्चे का दिमाग और दिल विकसित हो रहा होता है, यदि मां ऐसे वातावरण में रहती है जहां अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म किए जाते हैं, तो निश्चित ही शिशु के मतिष्क और रूप पर उसका सकारात्मक असर होता है।गर्भस्थ शिशु के शारीरिक विकास के लिए जहाँ ‘पुंसवन' संस्कार है वही गर्भ में पल रहे बच्चे के मानसिक विकास के लिए ‘सीमन्तोन्नयन’ संस्कार का विधान है, बालक के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए सूत्रों और चरक आदि सहिंताओं में माता के आहार और विहार के बहुत से नियम बताए गए हैं।

#इसका_वैज्ञानिक_दृष्टिकोण - गर्भवती महिलाएं अगर गर्भकाल के दौरान जंक फूड का सेवन करती हैं तो इससे होने वाले बच्चे पर भी असर पड़ता है। उनके बच्‍चों के भी ऐसे ही खान-पान का आदि बनकर मोटापे का शिकार बनने की आशंका बढ़ जाती है। यह तथ्य एडिलेड विश्वविद्यालय के शोध में सामने आया है।एडिलेड विश्वविद्यालय के शोधकर्ता डॉ. बेवर्ली मलहॉज्लर कहते है कि, “गर्भवती महिलाओं में बढ़ते मोटापे के कारण मोटापे और पाचन संबंधी बीमारियों का एक पीढ़ी दर पीढ़ी चक्र या कायम होने लगा है। संक्षेप में कहें तो, हम ऐसी माताओं को देख रहे हैं जो वजनदार संतान जन्म दे रही हैं जो आगे जाकर मोटे और कमजोर पाचनशक्ति वाले बन रहे हैं।“ इस शोध में यह पता चला कि गर्भावस्था के दौरान जो महिलाएं गलत भोजन करती हैं वे अपनी होने वाली संतान की पाचन क्रिया में भी बदलाव की स्थिति बनाती हैं और यह बच्चे बड़े होने पर आवश्यकता से अधिक भोजन करने के आदि होने लगते हैं। साथ ही इस कारण बच्चों के स्वाद में भी फेरबदल होता है जो सिर्फ चर्बीयुक्त और अधिक मीठा भोजन करना ही पसंद करते हैं।

#इस_संस्कार_अनुसार -
सीमन्तोन्नयन को सीमन्तकरण अथवा सीमन्त संस्कार भी कहते हैं। सीमन्तोन्नयन का अभिप्राय है सौभाग्य संपन्न होना। गर्भपात रोकने के साथ-साथ गर्भस्थ शिशु एवं उसकी माता की रक्षा करना भी इस संस्कार का मुख्य उद्देश्य है। इस संस्कार के माध्यम से गर्भिणी स्त्री का मन प्रसन्न रखने के लिये सौभाग्यवती स्त्रियां गर्भवती की मांग भरती हैं। यह संस्कार गर्भ धारण के छठे अथवा आठवें महीने में होता है। आयुर्वेद के आचार्य सुश्रुत के अनुसार छठे महीने में गर्भवती को गोक्षुर (गोखरू) में पकाए घी और यवागू का सेवन करना चाहिए । आचार्य चरक के अनुसार इस महीने में मधुर गण की औषधियों से दूध को सिद्ध करके उसमे से निकाले गए घी का सेवन करना चाहिए ,वहीँ भावप्रकाश के अनुसार पृश्निप्रणी , सहिजन, गोक्षुर एवं गंभारी में से उपलब्ध किसी भी औषधि के कल्क के साथ दूध का सेवन करना चाहिए । आयुर्वेदानुसार सातवे महीने में भी छठे महीने की तरह दूध के साथ घी का सेवन करना चाहिए | भावप्रकाश ने सातवें महीने में कमालविस, द्राक्षा, कसेरू, मुलेठी और मिश्री इन सभी औषधियों में से उपलब्ध औषधियों के कल्क का सेवन दूध के साथ करना चाहिए ।
आठवें महीने में आचार्य सुश्रुत ने बिल्व के काढ़े में वातहर एवं स्निग्ध द्रव्यों का सेवन करना चाहिए । इस महीने में बिल्व के क्वाथ में बला, अतिबला, नमक, शहद, दूध या घी को मिलाकर गर्भिणी को सेवन करना चाहिए | इससे गर्भिणी के पुराने मल का शोधन होता है एवं वायु का अनुलोमन होता है । इन औषधियों के सेवन पश्चात दूध एवं मधुर गण की औषधियों से तैयार तैल से अनुवासन बस्ती दी जानी चाहिए ।

सीमन्तोन्नयन संस्कार वैज्ञानिक दृष्टिकोण से हर कसौटी पर बिल्कुल खरा है , जो आज का विज्ञान रिसर्च कर रहा है ढूंढ रहा है वो सदियो से लोकोक्तियो में जीवित है और वैदिक साहित्य में धूल खा रहा है ।।

--------------------- #जातकर्म_संस्कार ----------------------
जन्म के बाद नवजात शिशु के नालच्छेदन (यानि नाल काटने) से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है, इसके लिए दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण तैयार होता है, जिसे घृत गुरु मंत्र के उच्चारण के साथ चटाया जाता है, इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है।
इस पूरी प्रक्रिया में करीब 30 मिनिट का समय लगता है।
वैज्ञानिक भी मानते हैं बच्चे के जन्म के 30 ​मिनिट के भीतर उसे मां का दूध पिलाना चाहिए, जबकि, इस नियम को सदियों पहले ही सनातन धर्म में लिखा जा चुका है।

#विज्ञान -
बच्चे को जन्म के तुरंत बाद रोना चाहिए। उसकी पीठ पर 2-3 बार धौल जमाएं। इसे साफ कपड़े में लपेट दें जिससे उसकी शक्ति का नुकसान न हो। सर्दियों में यह बेहद ज़रूरी होता है और यह उन बच्चों में और भी ज्यादा ज़रूरी होता है जो समय से पहले पैदा हो जाते हैं और बहुत कमज़ोर होते हैं। हवा का मार्ग साफ कर दें। इसके लिए प्लास्टिक के आईवी सेट (रोगाणुमुक्त) से गले के अंदर का पदार्थ चूस (खींच) कर निकाल दें। नाड़ को काट कर बांध दें। हर बार एक नया ब्लेड इस्तेमाल करें। नाड़ की मरहम पट्टी करने की ज़रूरत नहीं होती।साफ मुलायम कपड़े से बच्चे की ऑंखें पोछ दें। ऑंखों की संक्रमण बिमारीयो से बचाने के लिए ऑंखों को साफ रखे ।जितनी जल्दी हो सके माँ से बच्चे को अपना दूध पिलाने को कहें। जन्म के पहले कुछ घंटों में ही। इससे और दूध बनने में मदद मिलती है। पहले 2-3 दिनों में निकलने वाला दूध गाढ़ा और काफी प्रोटीन वाला होता है। इसमें संक्रमण से लड़ने के लिए प्रतिपिण्ड भी होते हैं।
पहले दो दिनों में बच्चा हरी काली गाढ़ी टट्टी करता है। इसे बच्चे पर से तुरंत साफ कर दें। अगर यह टट्टी शरीर पर ही कहीं सूख जाए तो इससे बच्चे की कोमल त्वचा को नुकसान पहुँचता है।

#संस्कार - नाल काटने के तरीके का उल्लेख -
जन्म के बाद नवजात शिशु के नालच्छेदन (यानि नाल काटने) से पूर्व इस संस्कार को करने का विधान है।
मुँह की सफाई शरीर की सफाई -
इस दैवी जगत् से प्रत्यक्ष सम्पर्क में आनेवाले बालक को मेधा, बल एवं दीर्घायु के लिये स्वर्ण खण्ड से मधु एवं घृत गुरु मंत्र के उच्चारण के साथ चटाया जाता है। दो बूंद घी तथा छह बूंद शहद का सम्मिश्रण अभिमंत्रित कर चटाने के बाद पिता बालक के बुद्धिमान, बलवान, स्वस्थ एवं दीर्घजीवी होने की प्रार्थना करता है।
जन्म लेते ही माता को स्तनपान का आदेश -
इसके बाद माता बालक को स्तनपान कराती है। ( यह स्तनपान विज्ञान के अनुसार जन्म होने के आधे घंटे अन्तर्गत कराये जाने वाला स्तनपान है ।

आधुनिक विज्ञान में जो भी जन्म लेने के बाद कि वैज्ञानिक आधार पर क्रियाएं है वही क्रियाएं हजारो सालो पहले से सनातन संस्कृति में उपलब्ध है लेकिन हम पिछड़े लोग है हमे सिर्फ पश्चिमी ठप्पा लगा ही चाहिए भले ही वो यही से चोरी किया हो ।।

#विशेष -
संस्कार का व्युत्पत्तिपरक अर्थ- सम् पूर्वक कृञ् धातु से घञ् प्रत्यय होकर संस्कार शब्द निष्पन्न होता है। जिसका अर्थ है- संस्करणं सम्यक्करणं वा संस्कारः अर्थात् परिष्कार करना अथवा भली प्रकार निर्माण करना ’ संस्कार’ है। भारतीय तत्त्ववेत्ताओं ने मनुष्य की अन्तःभूमि को श्रेष्ठता की दिशा में विकसित करने के लिए कुछ ऐसे सूक्ष्म उपचारों का भी आविष्कार किया है, जिनका प्रभाव शरीर तथा मन पर ही नहीं, सूक्ष्म अन्तःकरण पर भी पड़ता है और उसके प्रभाव से मनुष्य को गुण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से समुन्नत स्तर की ओर उठने में सहायता मिलती है। परिवार को संस्कारवान् बनाने की, कौटुम्बिक जीवन को सुविकसित बनाने की, एक मनोवैज्ञानिक एवं धर्मानुमोदित प्रक्रिया को संस्कार पद्धति कहा जाता है। हर्षोल्लास के वातावरण में देवताओं की साक्षी, अग्निदेव का सान्निध्य, धर्म- भावनाओं से ओत- प्रोत मनोभूमि, स्वजन- सम्बन्धियों की उपस्थिति, पुरोहित द्वारा कराया हुआ धर्म कृत्य, यह सब मिल- जुलकर संस्कार से सम्बन्धित व्यक्तियों को एक विशेष प्रकार की मानसिक अवस्था में पहुँचा देते हैं और उस समय जो प्रतिज्ञाएँ की जाती हैं, जो प्रक्रियाएँ कराई जाती हैं, वे अपना गहरा प्रभाव सूक्ष्म मन पर छोड़ती हैं और वह प्रभाव बहुधा इतना गहरा एवं परिपक्व होता है कि उसकी छाप अमिट नहीं, तो चिरस्थायी अवश्य बनी रहती है।

।। #धर्मसंस्थापनार्थाय_सम्भवामि_युगे_युगे ।।

#वैदिक_साहित्य_और_विज्ञान - #भाग - 11

----------------------- #जीवन_विज्ञान -----------------------

#16_संस्कारो_का_विज्ञान -

प्राचीन काल में ऋषियों ने संस्कारों का निर्माण मनुष्य के समग्र व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए किया था। यह विश्वास किया जाता था कि संस्कारों के अनुष्ठान से व्यक्ति में दैवी गुणों का आविर्भाव हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को अनुशासित किया जाना उसकी आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है। आध्यात्मिक उन्नति मानव के चरम विकास का पर्याय है संस्कारों से इसी की पूर्ति होती है।

सनातन धर्म में व्यक्ति के जीवन के लिए जो भी नियम बनाएं गए हैं, उनका वैज्ञानिक आधार भी है, जैसे जीवन को चार आश्रमों में बांटा गया है, इन आश्रमों में रहते हुए मनुष्य को 16 प्रकार के संस्कारों का पालन करना अनिवार्य माना गया है। जीवन के इन नियमों को बनाने का श्रेय महर्षि वेदव्यास को जाता है, मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु तक पवित्र सोलह संस्कार बनाएं गए हैं , और इसे मैं जीवन विज्ञान कहता हूँ ।।

सनातन संस्कृति के वैदिक साहित्यो में महर्षि अंगिरा ने 25 संस्कारों का जिक्र किया है, जबकि, कुछ जगहों पर मनुष्य जीवन के 48 तरीके बताए गए हैं, लेकिन इन सबमें सबसे सटीक विवरण महर्षि वेद व्यास ने किया है. यही कारण है कि हिंदुओं में उनके बताए गए 16 संस्कारों का प्रचलन है।

मनीषियों ने हमें सुसंस्कृत तथा सामाजिक बनाने के लिए पहले शोध किए और फिर परिणाम देखने के बाद नियमों का संकलन किया है। हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों को सामाजिक शास्त्र और मनोविज्ञान से जुड़े चिकित्सक और वैज्ञानिकों ने भी मान्यता दी है। मैं क्रमशः हर पोस्ट में 3 संस्कार के बारे में और उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विषय मे बताऊंगा ये 16 संस्कार है -
1. गर्भाधान, 2. पुंसवन, 3. सीमन्तोन्नयन, 4. जातकर्म, 5. नामकरण, 6. निष्क्रमण, 7. अन्नप्राशन, 8. चूड़ाकर्म, 9. कर्णवेध, 10. उपनयन, 11. वेदारम्भ, 12. समावर्तन, 13. विवाह, 14. वानप्रस्थ, 15. संन्यास एवं 16. अन्त्येष्टि

आज गर्भाधान और पुंसवन के बारे में आइये जानते है -

-------------------------- #गर्भाधान ---------------------------

योग्य, गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त करने के लिए मनुष्य जीवन का यह पहला संस्कार है, इसे गर्भाधान संस्कार कहा गया है, गृहस्थ जीवन में प्रवेश के उपरान्त प्रथम क‌र्त्तव्य के रूप में इस संस्कार को मान्यता दी गई है ।
#आधुनिक_वैज्ञानिक_दृष्टिकोण -
गर्भवती होने की सही उम्र 22 से 29 वर्ष होती है और इसमें भी सबसे उपयुक्त उम्र 25 की है। क्योंकि, इस समय एक युवती शारीरिक व मानसिक रूप से गर्भवती होने के लिए तैयार रहती है। मेंस्‍ट्रूएल पीरियड्स के सात दिन बाद ओव्‍यूलेशन साइकिल शुरू होती है और यह पीरियड्स के शुरू होने से सात दिन पहले तक रहती है। ओव्‍यूलेशन पीरियड ही वह समय होता है, जिसमें महिला गर्भधारण कर सकती है। इस स्थिति को फर्टाइल स्टेज भी कहते हैं। यदि स्त्री सहवास के वक्त ऑर्गज्‍म प्राप्त कर लेती है तो गर्भधारण की संभावना काफी हद तक बढ़ जाती है। क्योंकि, तब शुक्राणु को सही जगह जाने का समय और माहौल मिलता है तथा शुक्राणु ज्यादा समय तक जीवित रहते हैं।

#वैदिक_साहित्य_में -

#गर्भधारण_की_आयु -
आयुर्वेद के अनुसार पुरुष की न्यूनतम आयु 25 वर्ष तथा स्त्री की 16 वर्ष आवश्यक होती है। बच्चे के जन्म के पहले स्त्री और पुरुष को अपनी सेहत और मानसिक अवस्था का अनुमाप करना चाहिए, नियमों, तिथि, नक्षत्र आदि के अनुसार ही गर्भधारण करना चाहिए। ताकि शिशु निरोग और गुणवान हो सके।
गर्भाधान के संबध में स्मृतिसंग्रह में लिखा है -
निषेकाद् बैजिकं चैनो गार्भिकं चापमृज्यते।
क्षेत्रसंस्कारसिद्धिश्च गर्भाधानफलं स्मृतम्।।
अर्थात -
विधिपूर्वक संस्कार से युक्त गर्भाधान से अच्छी और सुयोग्य संतान उत्पन्न होती है। इस संस्कार से वीर्यसंबधी पाप का नाश होता है, दोष का मार्जन तथा क्षेत्र का संस्कार होता है। यही गर्भाधान-संस्कार का फल है।

#गर्भधारण_का_समय -
धर्मसूत्रों और स्मृति ग्रन्थों में गर्भाधान संस्कार का और भी विस्तृत निर्देश उपलब्ध होता है। इन ग्रन्थों में गर्भाधान के समय की उपयुक्तता और विधि पर सूक्ष्मतापूर्वक विचार किया जाता है। मनुस्मृतिकार पत्नी के ऋतु- काल की प्रथम चार रात्रि, ग्यारहवीं तथा तेरहवीं रात्रि का निषेध कर शेष दस रात्रियों को इस संस्कार के लिए प्रशस्त बतलाता है।
तासामाद्यश्चतस्रस्तु निन्दितेकादशी च या।
त्रयोदशी च शेषास्तु प्रशस्ताः दश रात्रयः।। मनु-3.47
इसके अतिरिक्त अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या, पूर्णिमा एवं सम्पूर्ण पर्व की रात्रियाँ भी इस कार्य के लिये निषिध्द मानी गई हैं -
अमावस्यामष्टमीं च पौर्णमासीं चतुर्दशीम्।
ब्रह्मचारी भवेन्नित्यामप्यृतौ स्नातको व्दिजः।। मनु- 4.128
पर्ववर्जं व्रजेच्चैनां तद्व्रतो रतिकाम्यया। मनु-3.45
महर्षि याज्ञवल्क्य शास्त्रविहित रात्रियों में भी मघा और मूल नक्षत्र के समय गर्भाधान का निषेध करते है-
मघां मूलं च वर्जयेत्।
भारतिय मनीषा मनोवांछित संतान - प्राप्ति हेतु यह परामर्श देती है कि पुत्रकामी को छठी, आठवीं, दसवीं, बारहवीं, आदि युग्म रात्रियों में गर्भाधान संस्कार सम्पन्न करना चाहिए और पुत्री चाहनेवालों को पाॅचवीं, सातवीं, आदि अयुग्म रात्रियों में-
युग्मासु पुत्रा जायन्तेऽस्त्रियोयुग्मासु रात्रिषु।
वस्तुतः भारतीय शास्त्रों ने गर्भाधान कर्म को एक पवित्र संस्कार का स्वरूप प्रदान किया है। शास्त्रकारों की स्पष्ट मान्यता है कि सहवास काल में पति- पत्नी के विचार - व्यवहार भावी सन्तति के संस्कार को पूर्णरूपेण प्रभावित करते हैं। केवल इन्द्रिय- सुख के उद्देश्य से सम्पन्न समागम के फलस्वरूप जो आकस्मिक गर्भाधान होता है, उससे धार्मिक, सदाचारी और यशस्वी सन्तान- प्राप्ति की आशा नहीं की जा सकती। अतः सर्वगुणसम्पन्न संन्तान के लिए गर्भाधान संस्कार में पति-पत्नी के तन-मन की पवित्रता के साथ-साथ मांगलिक परिवेश और ईश्वराराधन का विशेष अनुरोध दिखलाई पड़ता है। लगभग दो हजार वर्ष पूर्व के प्रसिद्ध चिकित्सक एवं सर्जन सुश्रुत ने अपनी पुस्तक सुश्रुत संहिता में स्पष्ट लिखा है कि मासिक स्राव के बाद 4, 6, 8, 10, 12, 14 एवं 16वीं रात्रि के गर्भाधान से पुत्र तथा 5, 7, 9, 11, 13 एवं 15वीं रात्रि के गर्भाधान से कन्या जन्म लेती है ।

#गर्भधारण_के_लिए - कामशास्त्र के अनुसार उचित आसनों का प्रयोग वर्णित है जल्द ही लिखूंगा । यौन कमियों को दूर करने के लिए कुछ आसान जो कामशास्त्र में बताये गए है और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समर्थित है-

#स्त्री_के_लिए - मुद्रासन - मुद्रासन तनाव को दूर करता है। महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े हए विकारों को दूर करने के अलावा यह आसन रक्तस्रावरोधक भी है। मूत्राशय से जुड़ी विसंगतियों को भी दूर करता है।
#पुरुष_के_लिए - पश्चिमोत्तनासन :सेक्स से जुड़ी समस्त समस्या को दूर करने में सहायक है। जैसे कि स्वप्नदोष, नपुंसकता और महिलाओं के मासिक धर्म से जुड़े दोषों को दूर करता है।

वैदिक साहित्य में उल्लेखित ज्ञान आज के आधुनिक समय के सभी मानकों पर खरा है । गर्भधारण के संदर्भ में एक पूर्ण ग्रन्थ ही संग्रहित है जिसे काम शास्त्र कहते है ,इस ग्रन्थ के विषय मे बहोत दुष्प्रचार किया जाता है हालांकि इसमें ऐसा कुछ भी नही है आज के सेक्स एजुकेशन से कही बेहतर और सटीक है ।।

------------------------- #पुंसवन -----------------------------
इसके तहत इस बात का ध्यान रखा जाता है कि गर्भ ठहर जाने पर भावी माता के आहार, आचार, व्यवहार, चिंतन, भाव सभी को उत्तम और संतुलित बनाने का प्रयास किया जाए ।

#आधुनिक_विज्ञानम - गर्भावस्था आम तौर पर तीन भागो( तिमाही) में बांटा गया है। पहली तिमाही में गर्भाधान से लेकर 12 से सप्ताह से है,गर्भाधान जब शुक्राणु अंडा निषेचित है। निषेचित अंडे तो फैलोपियन ट्यूब नीचे यात्रा और गर्भाशय के अंदर है, जहां यह भ्रूण और नाल आकार लेती है।पहली तिमाही के गर्भपात का सबसे ज्यादा खतरा (भ्रूण या भ्रूण की स्वाभाविक मृत्यु) माना जाता है।दूसरी तिमाही 13 सप्ताह से 28 सप्ताह है।जिसमे भ्रूण के आंदोलन को महसूस किया जा सकता है। 28 सप्ताह से अधिक समय के बच्चों को उच्च गुणवत्ता चिकित्सा देखभाल के ज़रिये 90% गर्भाशय के बाहर जीवित रखा जा सकता हैं। तीसरी तिमाही 29 सप्ताह से 40 सप्ताह क समय है।गर्भधारण के बाद मां को खान-पान पर विशेष ध्‍यान देना चाहिए। खान-पान से ही मां का स्‍वास्‍थ्‍य ठीक रहेगा और हेल्‍दी बच्‍चा भी पैदा होगा। गर्भावस्‍था की पहली तिमाही में अगर महिला पौष्टिक आहार का सेवन करे तो गर्भावस्‍था की जटिलतायें कम होंगी और गर्भपात होने की संभावना नही रहेगी। 11वे हफ्ते में भ्रूण के लगभग सभी अंग काम भी करना शुरू हो जाते है, साथ ही शिशु के जननांग भी पुरुष या महिला रूप लेना शुरू कर देते है।

#वैदिक_साहित्य -
संस्कारों में पुंसवन संस्कार द्वितीय संस्कार है। पुंसवन संस्कार जन्म के तीन माह के पश्चात किया जाता है। पुंसवन संस्कार तीन महीने के पश्चात इसलिए आयोजित किया जाता है क्योंकि गर्भ में तीन महीने के पश्चात गर्भस्थ शिशु का मस्तिष्क विकसित होने लगता है।
धर्मग्रथों में पुंसवन-संस्कार करने के दो प्रमुख उद्देश्य मिलते हैं। पहला उद्देश्य पुत्र प्राप्ति और दूसरा स्वस्थ, सुंदर तथा गुणवान संतान पाने का है। मूलत: यह संस्कार वे लोग करते हैं जिन्हें पुत्र की कामना होती है। दूसरा पुंसवन-संस्कार का उद्देश्य बलवान, शक्तिशाली एवं स्वस्थ संतान को जन्म देना है। इस संस्कार से गर्भस्थ शिशु की रक्षा होती है तथा उसे उत्तम संस्कारों से पूर्ण बनाया जाता है।

सुश्रुतसंहिता, यजुर्वेद आदि में तो पुंसवन संस्कार को पुत्र प्राप्ति से भी जोड़ा गया है। स्मृतिसंग्रह में यह लिखा है - गर्भाद् भवेच्च पुंसूते पुंस्त्वस्य प्रतिपादनम् अर्थात गर्भस्थ शिशु पुत्र रूप में जन्म ले इसलिए पुंसवन संस्कार किया जाता है।

इसके तहत इस बात का ध्यान रखा जाता है कि गर्भ ठहर जाने पर भावी माता के आहार, आचार, व्यवहार, चिंतन, भाव सभी को उत्तम और संतुलित बनाने का प्रयास किया जाए। जैसे अच्छा खान-पान, सकारात्मक वातावरण, परिवार का आर्शीवाद आदि बेहद अहम होते हैं, शिशु के गर्भ में आने के बाद यदि उसके परिवार का माहौल सकारात्मक नहीं है तो इससे आने वाले नए जीवन के मानसिक विकास पर फर्क आता है।

इस लिए पुंसवन संस्कार के तहत 9 से 11 माह के भीतर परिवारों में आध्यात्मिक पूजा पाठ, प्रवचन, कर्म कांड आदि करवाया जाना अनिवार्य है, कहा जाता है कि गर्भवति स्त्री को रोजाना गीता और रामायण जैसे पवित्र ग्रंथों का ध्ययन रोजाना करना चाहिए। इससे शिशु का विचार तंत्र विकासित होता है। अध्ययनों में पाया गया है कि संगीत को होने वाले बच्चे न सिर्फ महसूस कर सकते हैं, बल्कि वह उस पर हलचल भी करने लगते हैं। अध्ययनों के अनुसार, 23 हफ्ते के बच्चे संगीत को महसूस करना शुरू कर देते हैं। यहाँ तक कि वह आपकी आवाज भी सुन सकते हैं। बहुत से अध्ययनों में पाया गया गया है कि यदि आप गर्भावस्था के दौरान कोई किताब बोल-बोलकर पढ़ते हैं, या अपने बच्चे से बाते करते हैं। तो निसंदेह आपका बच्चा भी उसे महसूस करता हैं। इसी तरह से संगीत सुनकर बच्चे हलचल करना शुरू कर देते हैं। यहाँ तक कि कुछ अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि संगीत से बच्चे के मानसिक स्वास्थ्य और शारीरिक स्वास्थ्य पर भी अच्छा असर पड़ता है। संगीत सुनने के अलावा, महिलाओं के लिए यह भी जरूरी है कि वह किस तरह का संगीत सुने और कितनी वॉल्यूम में सुने। तो प्रेग्नेंट महिलाओं के लिए धीमी आवाज में मधुर संगीत सुनना बहुत अच्छा होता है। महाभारत का वो क़िस्सा तो आपने पढ़ा ही होगा कि अर्जुन के बेटे अभिमन्यु ने चक्रव्यूह में घुसने की कला मां के गर्भ में रहते हुए सीखी थी।उनके पिता अर्जुन, जब सुभद्रा को चक्रव्यूह भेदकर बाहर निकलने का तरीक़ा बता रहे थे, तो सुभद्रा सो गईं थी। इसलिए अभिमन्यु चक्रव्यूह में घुसने का तरीक़ा तो सीख गए, मगर उससे निकलने का नहीं। आख़िर में अभिमन्यु की मौत चक्रव्यूह में घिरकर हुई।
बहुत से लोग इस क़िस्से पर यक़ीन करते हैं। मगर, बहुत से इसे पौराणिक गल्पकथा मानकर गंभीरता से नहीं लेते। पर क्या वाक़ई में इंसान, मां के गर्भ में रहते हुए बहुत सी बातें सीखता है?

वैज्ञानिक इस सवाल का जवाब हां में देते हैं। खान-पान, स्वाद, आवाज़, ज़बान जैसी चीज़ें सीखने की बुनियाद हमारे अंदर तभी पड़ गई थीं, जब हम मां के पेट में पल रहे थे। इस लिए पुंसवन संस्कार के तहत 9 से 11 माह के भीतर परिवारों में आध्यात्मिक पूजा पाठ, प्रवचन, कर्म कांड आदि करवाया जाना अनिवार्य है, कहा जाता है कि गर्भवति स्त्री को रोजाना गीता और रामायण जैसे पवित्र ग्रंथों का ध्ययन रोजाना करना चाहिए। इससे शिशु का विचार तंत्र विकासित होता है जो आज के आधुनिक विज्ञान के मानकों पर बिल्कुल खरा है और जो रिसर्च अभी जीव विज्ञानी कर रहे है वो पहले से वैदिक साहित्य में उपलब्ध है ।।

#विशेष - महर्षि चरक के अनुसार- ‘‘संस्कारों हि गुणन्तराधानमुच्यते।’’ अर्थात् वस्तु में नये गुणों का आधान करने का नाम संस्कार है। मामूली से धातु अयस्क को जब विविध प्रक्रियाओं द्वारा संस्कारित किया जाता है तो वही पदार्थ बहुमुल्य धातु या रसायन बन जाती है। मनुष्य के अन्दर भी दिव्य गुणों का समावेश हो सके कुसंस्कारों का निष्कासन हो सके इसके लिए संस्कार आवश्यक है।प्राचीन काल में ऋषियों ने संस्कारों का निर्माण मनुष्य के समग्र व्यक्तित्व के परिष्कार के लिए किया था। यह विश्वास किया जाता था कि संस्कारों के अनुष्ठान से व्यक्ति में दैवी गुणों का आविर्भाव हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति के जीवन को अनुशासित किया जाना उसकी आध्यात्मिक उन्नति के लिए आवश्यक है। आध्यात्मिक उन्नति मानव के चरम विकास का पर्याय है संस्कारों से इसी की पूर्ति होती है। भारतीय संस्कृति के आदि प्रवक्ता भगवान मनु का कथन है कि ‘‘संस्कार शरीर को शुद्ध करके उसे आत्मा के निवास के उपयुक्त बनाते हैं। यह एक तथ्य है कि जन्म से प्रत्येक व्यक्ति शुद्र होता है, संस्कारों द्वारा परिमार्जित होकर ही वह द्विज बनता है। ‘जन्मना जायते शूद्र:, संस्काराद् द्विज उच्यते।’ इस तरह मानव जीवन को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने वाले आध्यात्मिक उपचार का नाम ही संस्कार है।’’

।। #धर्मसंस्थापनार्थाय_सम्भवामि_युगे_युगे ।।

#वैदिक_साहित्य_और_विज्ञान - #भाग - 10

--------------------- #सर्वेक्षण_विज्ञान ----------------------

सर्वेक्षण (Surveying) उस कलात्मक विज्ञान को कहते हैं जिससे पृथ्वी की सतह पर स्थित बिंदुओं की समुचित माप लेकर, किसी पैमाने पर आलेखन (plotting) करके, उनकी सापेक्ष क्षैतिज और ऊर्ध्व दूरियों का कागज या, दूसरे माध्यम पर सही-सही ज्ञान कराया जा सके। इस प्रकार का अंकित माध्यम लेखाचित्र या मानचित्र कहलाता है। ऐसी आलेखन क्रिया की संपन्नता और सफलता के लिए रैखिक और कोणीय, दोनों ही माप लेना आवश्यक होता है। सिद्धांतत: आलेखन क्रिया के लिए रेखिक माप का होना ही पर्याप्त है। मगर बहुधा ऊँची नीची भग्न भूमि पर सीधे रैखिक माप प्राप्त करना या तो असंभव होता है, या इतना जटिल होता है कि उसकी यथार्थता संदिग्ध हो जाती है। ऐसे क्षेत्रों में कोणीय माप रैखिक माप के सहायक अंग बन जाते हैं और गणितीय विधियों से अज्ञात रैखिक माप ज्ञात करना संभव कर देते हैं। इस प्रकार सर्वेक्षण में तीन कार्य सम्मिलित होते हैं -
1 - क्षेत्र अध्ययन
2 - मानचित्रण
3 - अभिकलन

#आधुनिक_विज्ञान -
सबसे प्राचीन प्रमाण ईसा से 370 वर्ष पूर्व का मिला है, जो ट्यूरिन के अजायबघर में आज भी सुरक्षित है। यूनान और मिस्र में भी शिलाओं और लकड़ी के तख्तों पर सर्वेक्षण के प्राचीन आलेख मिले हैं। ऑस्ट्रिया में ईसापूर्व काल के कुछ ऐसे चिह्न मिले हैं जिनसे पता लगता है कि रोम साम्राज्य में सर्वेक्षण का प्रचलन था। उन्होंने मार्गों की सीध बाँधने के लिए आज जैसे उपकरण, सर्वेक्षण पट्ट (plane table) और दूसरा नापने के लिए अंकित छड़ों का प्रयोग किया था। ऐसे भी प्रमाण मिले हैं कि 300 वर्ष ईसापूर्व भारत पर आक्रमण के समय, यूनानियों ने सिंध से फारस की खाड़ी तक समुद्रतट नापकर लेखाचित्र तैयार किया था ।

ये एक ऐसा झूठ है जो हम पर थोप दिया गया जबकि वैदिकों साहित्यो में इसके बारे में न सिर्फ विस्तार से उल्लेख है वरन आधुनिक विज्ञान से भी आगे है लेकिन हम सिर्फ पश्चिमी सभ्यता के अंधानुकरण में सब भुलाए बैठे है ।।

#वैदिक_साहित्यो_में -

#महाभारत_का_एक_श्लोक_है_जिसमे --
भगवांन वेद व्यास द्वारा पृथ्वी की भौगोलिक रचना का विवरण महाभारत में किया गया है। उन्होंने महाभारत में उल्लेखित किया है कि यह पृथ्वी चन्द्रमंडल से देखने पर दो अंशों में खरगोश तथा अन्य दो अंशों में पीपल के दो पत्तों, के समान दिखायी देती है।

“सुदर्शनं प्रवक्ष्यामि द्वीपं तु कुरुनन्दन।
परिमण्डलो महाराज द्वीपोऽसौ चक्रसंस्थितः॥
यथा हि पुरुषः पश्येदादर्शे मुखमात्मनः।
एवं सुदर्शनद्वीपो दृश्यते चन्द्रमण्डले॥
द्विरंशे पिप्पलस्तत्र द्विरंशे च शशो महान्।”
#अर्थात --
सुदर्शन नामक यह द्वीप चक्र की भाँति गोलाकार स्थित है, जैसे पुरुष दर्पण में अपना मुख देखता है, उसी प्रकार यह द्वीप चन्द्रमण्डल में दिखायी देता है। इसके दो अंशो में पिप्पल और दो अंशो में महान शश (-खरगोश) दिखायी देता है। यदि उपरोक्त संरचना को कागज पर बनाकर व्यवस्थित करें, तो हमारी पृथ्वी का मानचित्र बन जाता है, जो हमारी पृथ्वी के वास्तविक मानचित्र के समान है।
(वेद व्यास, भीष्म पर्व, महाभारत)
(इसका चित्र प्रथम कमेंट में )

पृथ्वी की परिधि की गणना या सर्वेक्षण विज्ञान प्राचीन ही नही अतिप्राचीन और वैदिक है जिसकी पुष्टि हमे आर्यभट्ट की गणना से प्राप्त हो जाती है पूर्व में एक प्रश्न मुझसे पूछा गया था कि महाभारत काल मे आकाश से कैसे देख कर इस श्लोक की रचना की गयी तो इसका जवाब मुझे मिला आर्यभट्ट रचित ग्रन्थो में आइये इसका विश्लेषण करते है -

आर्यभट कि गणना के अनुसार पृथ्वी की परिधि 39,968.0582 किलोमीटर है, जो इसके वास्तविक मान 40,075.0167 किलोमीटर से केवल 0.2% कम है।
महाविज्ञानी आर्यभट्ट के ग्रन्थों में भूपरिधि की नाप का विधि का अस्पष्ट निर्देश प्राप्त होता है। 11वीं शताब्दी में भास्कराचार्य ने इसकी विधि का स्पष्ट उल्लेख किया है।

#विधि - (#technical_detail) -
सर्वेक्षण करने के लिये प्रमुखत: दो तथ्यों को जानना आवश्यक होता है। प्रथम, किसी निश्चित स्थान B के सापेक्ष किसी अन्य स्थान A पर पृथ्वी का झुकाव। अथवा भूमध्य रेखा के सापेक्ष उसके उत्तर या दक्षिण में किसी स्थान पर पृथ्वी का झुकाव या उसका अक्षांश। इसे प्राचीन ग्रन्थों में सार्थक रूप से अक्षांश नाम दिया गया था। इसका मौलिक अर्थ है, अक्ष यानी पृथ्वी की धुरी या केन्द्रबिन्दु से भूपरिधि के किसी बिन्दु B तक खीची गई रेखा तथा उसी केन्द्रबिन्दु से भूपरिधि के किसी अन्य बिन्दु A तक खींची गई रेखा की परस्पर कोणात्मक दूरी या अंश ही अक्षांश है। द्वितीय तथ्य, उस B स्थान से A स्थान की दूरी। इन दो तथ्यों को जानने के पश्चात् भूपरिधि को जानने के लिये अनुपात—विधि का प्रयोग होता है यदि B के सापेक्ष A स्थान के झुकाव पर B से A की अमुक दूरी हो तो गोल पृथ्वी के 360 अंश झुकाव पर कितनी दूरी होगी।

भारतीय ज्योतिष में इन सूचनाओं के आधार पर भूपरिधि का मान ज्ञात कर लिया गया था। सूर्य सिद्धान्त में पृथ्वी का मान 1600 योजन बताया है तथा 1600 & 10 को भूपरिधि माना है। प्राचीन काल में योजन का मान अनिश्चित रहा है , जैसे आज सम्पूर्ण भारत मे बीघा का मान अलग अलग माप का है वैसे ही योजन का मान भी अलग अलग माना गया है ।चीनी यात्री हवेन्सांग के एक विवरण के अनुसार 16,000 या हस्त का एक योजन होता है , तथा इस प्रकार 24,000 फीट का एक योजन होगा। इंग्लिश माप के अनुसार 4854 फीट का एक मील होता है। इस प्रकार 4.94 मील का एक योजन सिद्ध होता है। इस गणना के अनुसार 7904 मील पृथ्वी का व्यास तथा 24994 मील भूपरिधि बनती है। इसे 8/5 से गुणित करने पर 39991 किलोमीटर भूपरिधि सिद्ध होती है। आधुनिक मान्यता इसके बहुत समीप है। प्रकटत: उन्होंने अपनी रीति से भूपरिधि का सही मान प्राप्त करने में सफलता पाई थी।

उपरोक्त विवरण अनुसार इस विधि के परिचालन के लिये उस स्थान के अक्षांश का परिज्ञान आवश्यक है। इसके लिये यह श्लोक कहा गया है —

शंकुच्छायाहते त्रिज्ये विषुवत्कर्णभाजिते।
लम्बाक्षज्ये तयोश्चापे लम्बाक्षौ दक्षिणौ सदा।।

अर्थात् शंकु और उसकी छाया को अलग—अलग त्रिज्या से गुणा करके प्रत्येक गुणनफल को विषुवत्कर्ण से भाग देने पर लम्बज्या और अक्षज्या प्राप्त होती है, जिनके चाप अथवा कोण क्रमश: लम्बांश और अक्षांश होते हैं।
इससे प्रकट है कि उस स्थान A पर शंकु और कर्ण के बीच बनने वाला धनु या कोण उस स्थान का अक्षांश होता है। इसे प्राप्त करने की विधि इस प्रकार है। विषुव संक्रान्ति के दिन जब दिन रात बराबर होते हैं। अथवा यों कहें कि जिस दिन भूमध्य रेखा पर सूर्य सीधा अथवा लम्बवत् चमकता है, (स्पष्टत: उस दिन मध्याह्न में किसी सीधे शंकु या डण्डी की छाया बिल्कुल नहीं बनेगी) उस दिन उस भूमध्यरेखा से उत्तर या दक्षिण दिशा में किसी सुदूर स्थान पर 12 अंगुल की सीधी डण्डी अवनदध करते हैं। इससे उत्तर दिशा मे उत्तर कि ओर उस डण्डी की पलमा अथवा छाया पडेगी। अधिकाधिक उत्तर की ओर जाने पर यह छाया अधिकाधिक लम्बी होती जायगी इस डण्डी तथा धरती पर पडी छाया से जो कर्ण बनेगा, वह भूमध्य के सापेक्ष उस स्थान पर धरती के झुकाव को सूचित करेगा। अत: शंकु और कर्ण पर बनने वाला कोण ही वहां का झुकाव अथवा उस स्थान का अक्षांश सिद्ध होता है।

किसी कोण को बनाने वाली दो सरल रेखाओं को चाहे जितना बढ़ाया जाय, उनसे कोणात्मक दूरी बदलती नही है केवल योजानात्मक दूरी बदलती है यह यहां धरती के केन्द्रबिन्दु से परिधि तक चलने वाली दो रेखाएं बहुत बड़ी है तथा शंकु और कर्ण की रेखाएं बहुत छोटी है। फिर भी इस शंकु कर्ण पर बनने वाला कोण तदनुरूप है, अत: धरती के अक्षांश के ठीक समतुल्य कोण को प्रकट करता है। इसे रेखा गणितीय नियमो के आधार पर भी सिद्ध किया जा सकता है।
पोस्ट में दिए चित्र में पृथ्वी के केन्द्रबिन्दु पर BCA कोण प्राप्त किया गया है, जो कि 30 अंश है। यही भूपरिधि के A बिन्दु का आक्षांश है। चित्र से स्पष्ट देखा जा सकता है कि इस A बिन्दु पर किसी शंकु को अवनद्ध करने पर जो छायाकर्ण बनता है, वह भी ठीक 30 अंश कोण बनाता है। इससे वराहमिहिर का यह कथन समुचित है कि यह कोण अक्षांश कोण को प्रकट करता है।

चित्र से यह भी देखा जा सकता है कि भूमध्य रेखा B पर सूर्यकिरणें सीधी लम्बवत् पड़ रही है। छोटे त्रिभुज के छायाकर्ण B पर भी वह सीधी पड़ रही है। परन्तु हमारी दृष्टि से CB छायाकर्ण टेढ़ा है तथा क्त्र शंकु सीधा है। यह CA शंकु CB छायाकर्ण के साथ उतना कोण बनाता है, जितना कोण भूमध्य रेखा B के सापेक्ष परिधि के A स्थान पर हम स्वयं प्राप्त करते है। अत: यही कोण अक्षांश कोण है।

उदाहरण के लिये मध्य प्रदेश के #उमरिया जिले से होकर कर्क रेखा गुजरती है। इसके ठीक उत्तर में लखनऊ जिला है। कर्क संक्रान्ति के दिन लखनऊ में शंकु की स्थापना से 3.2 अंश का कोण प्राप्त होता है। भूमध्यरेखा से कर्क रेखा 23.36 है। अत: भूमध्य रेखा से लखनऊ का अक्षांश 23.36 +3.2 = 26.56 सिद्ध होता है। परन्तु कर्क रेखा के सापेक्ष लखनऊ जिले की धरती का झुकाव 3.2 अंश है। साथ ही यह भी जान लिया गया है कि उमरिया की कर्क रेखा से लखनऊ की दूरी 352 किलोमीटर है। अत: अनुपात विधि से भूपरिधि का मान निकलेगा
352 x 360 = 39600 किलोमीटर 3.2
इस अनुपात विधि को इस श्लोक में प्रकट किया गया है—

पुरान्तरं चेदिदमुत्तरं स्यात्तदक्षविश्लेषलवैस्तदा किम्।
चक्रांशकैरिव्यनुपात युक्तया युक्तं निरुक्तं परिधे: प्रमाणम्।।
(सिद्धांत शिरोमणि, भुवनकोश, श्लोक 14)

अर्थात् भूमध्यरेखा से उस आलोच्य स्थान A के अक्षांश में से कर्क रेखा के अक्षांश को घटाने पर प्राप्त अक्षांश में यदि पुरात्तर अर्थात् उस AB रेखा के बीच इतनी दूरी है, तो सम्पूर्ण चक्रांश 360 अंश में कितने योजन की दूरी होगी। इस अनुपात के प्रयोग से सम्पूर्ण भूपरिधि का प्रमाण ज्ञात होता है।
जैसे, उपरिलिखित उदाहरण में,
भूमध्य रेखा के सापेक्ष लखनऊ का अक्षांश — 26.56
कर्क रेखा का अक्षांश — 23.36
कर्क रेखा के सापेक्ष लखनऊ का झुकाव — 26.56—23.36 = 3.2
इस 3.2 अंश झुकाव पर कर्क रेखा से लखनऊ की दूरी पर अनुपात विधि का प्रयोग करने से भूपरिधि का प्रमाण ज्ञात होता है।

आधुनिक युग में भी भूपरिधि इसी विधि से नापी जाती है परन्तु सूक्ष्म यन्त्रों के प्रयोग से यह कार्य अत्यन्त सूक्ष्मता से किया जाता है।

प्राचीन रीति से सम्पूर्ण भूपरिधि का प्रमाण ज्ञात करने के पश्चात् एक अंश में धरती के फासले को भी आसानी से जाना जाता है। प्राचीन काल में कालखण्ड के आधार पर भी धरती की दूरी का पता लगाया जाता है। उस समय एक अहोरात्र में 60 घटी माने गए थे। अत: 39600/60 = 660 किलोमीटर, यह एक घटी देशान्तर कहा जाता है।
आधुनिक युग में भी इसी रीति से एक घण्टा देशान्तर को प्रकट करने की परम्परा है। आधुनिक गणना अनुसार 1 अहोरात्र 24 घण्टे का होता है। अत: 39600/24 =1650 किलोमीटर को एक घण्टा देशान्तर कहा जाता है। घटी से देशान्तर को प्रकट करने की परम्परा आधुनिक पंचागों में भी पाई जाती है।

इसके अतिरिक्त वैदिक साहित्य में कौटिल्य के अर्थशास्त्र और बाणभट्ट के हर्षचरित् में राजस्व के निर्धारण के सिलसिले में भूमि की नाप आदि के उल्लेख मिलते हैं। 1498 ई. में वास्को डा गामा के भारत आने पर एक गुजराती पंडित ने उसे समुद्रतट का एक रेखाचित्र भेंट किया था। इससे विदित होता है कि सभ्यता के मार्ग पर बढ़े हुए सभी देशों में सर्वेक्षण का महत्व निरंतर बढ़ता रहा और कृषि, राजस्व, भूमि के अधिकार की सीमाओं के निर्धारण और यात्राओं में मार्गों के लेखाचित्र बनाने में सर्वेक्षण का अभ्यास एवं प्रयोग होता रहा है।

#विशेष -
भारत में प्राचीनकाल से ही ज्ञान को अत्यधिक महत्व दिया गया है। कला, विज्ञान, गणित और ऐसे अनगिनत क्षेत्र हैं जिनमें भारतीय योगदान अनुपम है। आधुनिक युग के ऐसे बहुत से आविष्कार हैं, जो भारतीय शोधों के निष्कर्षों पर आधारित हैं। विज्ञान के गूढ रहस्यों की सूक्ष्मतम जानकारी भारतीयो को बहुत प्राचीन समय से रही है। सृष्टि के आदि से ही वैदिक साहित्य में निहित ज्ञान-विज्ञान से ऋषि मुनि विज्ञान के गूढ़ रहस्यों का साक्षात्कार करते आये है , सर्वेक्षण विज्ञान उनमे से ही एक है जो अभी भी उपेक्षित पड़ा हुआ है, ऐसे बहोत से वैज्ञानिक अविष्कार हैं जो आधुनिक समय से भी उन्नत तकनीक रखते थे जो धीरे धीरे विस्मृत होते जा रहे है उसे पुनर्जीवित करने की महती आवश्यकता है ।धर्म, दर्शन, विज्ञान, वास्तु, ज्योतिष, खगोल, स्थापत्य कला, नृत्य कला, संगीत कला आदि सभी तरह के ज्ञान का जन्म भारत में हुआ है ऐसा कहने में कोई गुरेज नहीं, क्योंकि इसके हजारों सबूत हैं। मध्यकाल में भारतीय गौरव को नष्ट किया गया और आज का तथाकथित भारतीय व्यक्ति पश्चिमी सभ्यता को महान समझता है।

#सोर्स -
Aryabhata I, His Life and His Contributions". Bulletin of the Astronomical Society of India
http://hdl.handle.net/2248/502
Cooke (1997). "The Mathematics of the Hindus". पृ॰ 204.
"Astronomy in India", written at London, in Walker, Christopher, Astronomy before the Telescope, British Museum Press by Pingree, David (1996)
सुद्युम्न आचार्य का लेख निदेशक, वेद वाणी वितान, प्राच्य विद्या शोध संस्थान,सतना(म.प्र.)
वाल्टर यूजीन क्लार्क, द Āryabhaṭīyaऑफ Āryabhaṭa, गणित और खगोल विज्ञान पर एक प्राचीन भारतीय कार्य, शिकागो विश्वविद्यालय प्रेस
महाभारत
#क्रमशः
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